उत्तराखंडराजनीति

गढ़वाल संसदीय सीट: जिस भी ब्राह्मण प्रत्याशी को मिलेगा क्षत्रिय वोटरों का आशीर्वाद, उसी की नाव चुनाव में होगी पार

-पीएम मोदी, सीएम धामी का जादू ही पैदा कर पाएगा एक बड़ा अंतर

देहरादून। बावन गढ़ों की धरती गढ़वाल संसदीय क्षेत्र में इस बार लोकसभा चुनाव का मुकाबला बेहद दिलचस्प है। क्षत्रिय बहुल गढ़वाल संसदीय सीट पर दो ब्राह्मण प्रत्याशियों
के बीच सीधी जंग है। ऐसे में इस सीट पर क्षत्रिय वोटरों की भूमिका बेहद अहम और निर्णायक हो गई है। हालांकि पिछले कुछ सालों का ट्रेंड यही रहा है की क्षत्रिय वोटर लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ गया है। यही वजह रही जो विपक्ष से सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत जैसे बड़े क्षत्रिय चेहरे होने के बाद भी ब्राह्मण प्रत्याशी भुवन चंद खंडूड़ी पांच बार यहां से चुनाव जीते। चूंकि इस बार दोनों प्रत्याशी ब्राह्मण हैं, इसीलिए क्षत्रिय वोटरों की भूमिका बेहद निर्णायक और अहम हो गई है।
पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत का भी गृह जनपद पौड़ी ही हैं। यहां के लोग अपने खेरासैन के लाल त्रिवेंद्र को सीएम पद से अकारण हटाए जाने से भी नाराज हैं। लोगों की नाराजगी अभी भी अंदरखाने बनी हुई है। लोग न सिर्फ त्रिवेंद्र को हटाए जाने से नाराज हैं, बल्कि जिस तरह दिल्ली से बैठकर उनकी सरकार को अस्थिर करने के लगातार प्रयास हुए। अब लोग हिसाब किताब बराबर करने को तैयार बैठे हैं। अभी लोगों की नाराजगी दूर भी नहीं हुई थी की फिर गढ़वाल के एक और बेटे पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत का उनके घर में ही टिकट काट दिया गया। इससे पहले उनके सीएम वाले तीन महीने के कार्यकाल को भी कुछ लोगों ने अजीब तरीके से प्रचारित कराया गया। सरल, सहज भाव के तीरथ को बुरी तरह ट्रैप करवा दिया गया। इस नाराजगी को दूर करने में
पीएम मोदी और सीएम धामी के काम अहम भूमिका निभाएंगे। इन्हीं कामों और मोदी धामी की लोकप्रियता के कारण इस समय भाजपा प्रत्याशी अनिल बलूनी के पास मनोवैज्ञानिक बढ़त जरूर है, लेकिन राजनीतिक जानकार कांग्रेस प्रत्याशी गणेश गोदियाल को भी बिलकुल हल्के में नहीं ले रहे हैं।
ये वही गोदियाल हैं, जिन्होंने भाजपा के दिग्गज रमेश पोखरियाल को उन्हीं के घर में 2002 के विधानसभा में हरा कर सभी को चौंका दिया था। उसके बाद 2012 में भाजपा के चुनावी मैनेजमेंट में एक्सपर्ट माने जाने वाले धन सिंह रावत को उन्हीं के घर में हरा दिया था। 2017 और 2022 में धन सिंह चुनाव गोदियाल से जीते जरूर, लेकिन बेहद नजदीकी मुकाबले में। 2022 में तो पोस्टल बैलेट ने जीत में अहम भूमिका निभाई। उस चुनाव में जानकारों का ये भी मानना है की यदि गोदियाल कांग्रेस के टिकट वितरण में 20 दिन दिल्ली न उलझे होते, तो नतीजा कुछ भी हो सकता था।
गोदियाल कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति अध्यक्ष रहते हुए उनकी पहुंच पूरे गढ़वाल संसदीय क्षेत्र पर रही। भाजपा ने उन पर गढ़वाल क्षेत्र के गांव गांव के मंदिरों को सुधारने को बजट जारी करने के भी आरोप लगाए थे। गोदियाल को करीब से जानने वाले उनके मिजाज से भली भांति वाकिफ है। वे भले ब्राह्मण हों, लेकिन उनका मिजाज क्षत्रिय जैसा ही है। वो लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। जबकि भाजपा प्रत्याशी अनिल बलूनी का मूवमेंट गोदियाल के मुकाबले कम रहा है। खराब सेहत के कारण भी वे बेहद बड़े, दुर्गम गढ़वाल संसदीय क्षेत्र का चाह कर भी भ्रमण नहीं कर पाए। अब नामांकन के बाद मतदान होने तक उनके लिए पूरे क्षेत्र तक पहुंचना आसान नहीं होगा। बलूनी की क्षेत्र की बजाय दिल्ली में ही सक्रियता को भी कांग्रेस निशाने पर लेकर चल रही है। कांग्रेस की मीडिया टीम ने हमले भी तेज कर दिए हैं। प्रवक्ता गरिमा दसोनी ने सोशल मीडिया पर बलूनी के दिल्ली तक सीमित रहने और कभी ग्राउंड जीरो पर जनता के बीच न रहने का भी आरोप लगाया।
ऐसे में अब भाजपा प्रत्याशी को पीएम मोदी और सीएम धामी के कार्यों को जनता के बीच पहुंचा कर अपनी चुनावी वैतरणी पार करनी होगी। साथ ही राजपूत वोटरों को साध कर रखना होगा। इस दिशा में उन्होंने पौड़ी तारामंडल का नाम दिवंगत पूर्व सीडीएस जनरल बिपिन रावत के नाम पर रख कर राजपूत वोटरों को साधने की ओर कदम बढ़ा दिए हैं।

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