उत्तराखंड

गुड़ की मिठास-घुघुतिया का स्वाद घोलता उत्तरायणी का त्योहार

देहरादून। उत्तराखंड में हर तीज-त्योहार का अपना अलग ही उल्लास है। यहां शायद ही ऐसा कोई पर्व होगा, जो जीवन से न जोड़ता हो। ये पर्व-त्योहार उत्तराखण्डी संस्कृति के प्रतिनिधि भी हैं और संस्कारों के प्रतिबिंब भी। हम ऐसे ही अनूठे पर्व ‘मकरैंण’ से आपका परिचय करा रहे हैं। यह पर्व गढ़वाल, कुमाऊं व जौनसार में अलग-अलग अंदाज में मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति का त्यौहार उत्तराखण्ड में उत्तरायणी, उत्तरैण आदि नामों से जाना जाता है। उत्तरायणी शब्द उत्तरायण से बना है। उत्तरायण मतलब जब सूर्य उत्तर की ओर जाना शुरू होता है। दरअसल, त्योहार एवं उत्सव देवभूमि के संस्कारों में रचे-बसे हैं। पहाड़ की ‘पहाड़’ जैसी जीवन शैली में वर्षभर किसी न किसी बहाने आने वाले ये पर्व-त्योहार अपने साथ उल्लास एवं उमंगों का खजाना लेकर भी आते हैं।
हिन्दुओं के सबसे पवित्र धार्मिक आयोजनों में से एक मकर सक्रांति भी है। सूर्य ग्रह के मकर राशि में प्रवेश करने के कारण मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 14 जनवरी को पड़ रहा है। मकर संक्रान्ति के दिन गंगा स्नान और दान पुण्य का विशेष महत्व है। साल 1982 में उत्थान मंच में उत्तरायणी मेले का पहली बार आयोजन किया गया था। चार दशक बाद भी पूरे रीति-रिवाजों के साथ इस त्योहार को मनाया जाता है। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मकर संक्रांति के पर्व को अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। आंध्रप्रदेश, केरल और कर्नाटक में इसे “संक्रांति” कहा जाता है और तमिलनाडु में इसे “पोंगल पर्व” के रूप में मनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा में इस समय नई फसल का स्वागत किया जाता है और लोहड़ी पर्व के रूप में मनाया जाता है। वहीं असम में “बिहू पर्व” के रूप में इस पर्व को उल्लास के साथ मनाया जाता है।
इस अवसर पर कुमाऊ क्षेत्र के बागेश्वर जिले में प्रसिद्ध उत्तरायणी कौथिक (मेला) का आयोजन किया जाता है। यह उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में आयोजित सबसे बड़े मेलों में से एक है और हर साल 14 जनवरी को आयोजित होने वाले मकर संक्रांति उत्सव के दौरान मनाया जाता है। उत्तरायणी महोत्सव उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में मनाया जाता है। मेले में आने वाले देश-विदेश के पर्यटक व स्थानीय लोग यहां पर होने वाली विभिन्न गतिविधियों के साथ मनोरंजन का भी आनंद लेते हैं। साथ ही, स्वादिष्ट भोजन का आनंद उठा सकते हैं और राज्य के हस्तनिर्मित शिल्प खरीद सकते हैं। भारत में सबसे लोकप्रिय मेलों में से एक के रूप में जाना जाता है, उत्तरायणी मेला बागेश्वर में शुरू हुआ, लेकिन अब उत्तराखंड के अंदर और बाहर विभिन्न शहरों में फैल गया है। यह त्योहार स्थानीय लोगों के लिए अपनी संस्कृति, विरासत, नृत्य और संगीत को प्रदर्शित करने का एक अवसर है।
एक राजा था, जिसकी कोई संतान नहीं थी तो मंत्री हर वक्त इस षड्यंत्र में रहता था कि राजा के बाद राज्य उसे मिल जाए। लेकिन एक संत के आशीर्वाद से राजा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई। प्रसन्न होकर रानी मां बेटे को एक माला पहना दी। युवराज थोड़ा बड़ा हुआ और खेलने-कूदने लगा। उसे ये माला बहुत प्रिय थी। रानी अपने बेटे को प्यार से घुघुतिया कहकर बुलाती थी। जब राजकुमार शैतानी करता तो वह कहती कि तंग मत कर नहीं तो तेरी माला कौंवे को दे दूंगी। फिर वह कहने लगती, काले कौंवा काले घुघुति माला खा ले। यह सुनकर बहुत से कौंवे आ जाते थे। रानी मां उनके लिए भी रोटी और दाने डाल देती। धीरे-धीरे वे कौंवे राजकुमार के मित्र बन गए। उधर मंत्री का षड्यंत्र जारी था। एक दिन उसने राजकुमार का अपहरण कर लिया। जब मंत्री के साथी राजकुमार को लेकर जंगल जा रहे थे तो उसके रोने की आवाज सुनकर बहुत से कौवे आ गए। उन्होंने उसकी घुघती माला पहचान ली और गले से झपट कर उड़ गए। तभी से उत्तराखंड में घुघुती माला बनाए जाने की पंरपरा चल पड़ी। बच्चे घुघुती की बनी माला गले में डाल लेते हैं और कौवों को बुलाते हैं। काले कौवा काले घुघुति माला खा ले। उत्तराखंड की वादियों में ये आवाज आज भी गूंज रही है।

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