हाईकोर्ट ने कहा बालिग को पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार

नैनीताल। हाईकोर्ट ने अंतरधार्मिक प्रेम संबंध और प्रस्तावित विवाह के चलते जान का खतरा जताने वाले बालिग जोड़े को सुरक्षा मुहैया करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है।
न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ ने अजहरुद्दीन अली एवं अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य व अन्य मामले पर यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे संबंध में हैं और विवाह करना चाहते हैं, लेकिन याचिका में बनाये गए परिवार और रिश्तेदार सदस्य पक्षकार इसका विरोध कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें धमकियां दी जा रही हैं और उन्हें अपनी जान व व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर गंभीर खतरा है। जबकि दोनों अलग-अलग धर्मों से तालुक रखते हैं।
अदालत को बताया गया कि दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं। दस्तावेजों के अनुसार पहले याचिकाकर्ता की उम्र 24 वर्ष और दूसरे याचिकाकर्ता की उम्र 29 वर्ष है। दूसरे याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष कहा कि वह अपनी इच्छा से पहले याचिकाकर्ता के साथ रह रही है।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस से खतरे की स्थिति और सुरक्षा के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी मांगी। इस पर कुंडा थाना, काशीपुर के थानाध्यक्ष धीरेंद्र कुमार और केलाखेड़ा थाना, बाजपुर के उपनिरीक्षक मनीष खत्री वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में पेश हुए। दोनों अधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं और पहले याचिकाकर्ता के परिवार को आवश्यकता पड़ने पर पर्याप्त सुरक्षा देने का आश्वासन दिया।
दूसरी याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वह अपने साथी के साथ विवाह कर उसे कानून के अनुसार पंजीकृत कराना चाहती है, लेकिन धमकी और भय के कारण सक्षम प्राधिकारी के समक्ष नहीं जा पा रही है। उन्होंने यह भी बताया कि उनके शैक्षणिक प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेज उनके मायके में हैं। पुलिस अधिकारियों ने विवाह कराने अथवा पंजीकरण में आवश्यक सुरक्षा व सहयोग तथा प्रमाणपत्र प्राप्त करने में सहायता का आश्वासन दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि बालिग और सक्षम व्यक्ति को अपने जीवन से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार है, जिसमें जीवनसाथी चुनना भी शामिल है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार है और परिवार या अन्य लोगों की असहमति के आधार पर धमकी, हिंसा या उत्पीड़न को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर प्रस्तावित विवाह की वैधता या पक्षकारों के आपसी अधिकारों के संबंध में कोई राय नहीं दे रहा है। अदालत ने केवल याचिकाकर्ताओं के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को गैरकानूनी धमकी, डराने-धमकाने, उत्पीड़न के साथ ही सुरक्षा देने पर विचार किया। हाईकोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं और पहले याचिकाकर्ता के परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। यदि उनकी जान या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए कोई वास्तविक अथवा आसन्न खतरा सामने आता है, तो पुलिस तत्काल कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करे। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता विवाह कराने या उसका पंजीकरण कराने के लिए सक्षम प्राधिकारी के पास जाते हैं, तो पुलिस उन्हें आवश्यक सहायता और सुरक्षा उपलब्ध कराए। उसकी रिपोर्ट अगली तिथि को कोर्ट में पेश करे।





