उत्तराखंड

सूक्ष्म सत्ता ‘ईश्वर’ का स्थूल स्वरूप होते हैं ‘परम गुरू’ः स्वामी नरेन्द्रानन्द

देहरादून। ‘दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान’-देहरादून में भक्तों का जैसे एक सैलाब उमड़ पड़ा। सुबह से ही भक्तजनों में एक नव उत्साह का संचार हो रहा था। आश्रम से लगते हुए नवीन प्लॉट का उद्घाटन किए जाने का अवसर होने के कारण यहीं पर ‘भूमि पूजन’ के रूप में हवन-यज्ञ के साथ-साथ ‘दिव्य ज्योति वेद मंदिर’ के वेदज्ञों द्वारा अनुपम ऋचाओं का गायन भी किया गया। इस अवसर पर दिल्ली से विशेष रूप से कार्यक्रम में पधारे ‘दिव्य गुरु आशुतोष महाराज’ के शिष्य स्वामी नरेन्द्रानन्द ने संस्थान के अनेकों भक्तों-साधकों के साथ हवन कुंड में ‘विश्व शांति’ की कामना के साथ अपनी समिधा अर्पित की। इस अवसर पर संस्थान की देहरादून संयोजक साध्वी विदुषी अरुणिमा भारती सहित साध्वी जाह्नवी भारती, साध्वी सुभाषा भारती तथा साध्वी अनीता भारती ने भी हवन-यज्ञ में भाग लेकर अपनी आहुतियां समर्पित कीं। इसके बाद मुख्य भवन के आश्रम सभागार में साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम को आयोजित किया गया। भजनों की अविरल प्रस्तुति ने भक्तजनों का मन मोहा।
भजनों की विस्तृत व्याख्या साध्वी विदुषी सुभाषा भारती तथा साध्वी विदुषी अनीता भारती ने संयुक्त रूप से करते हुए मंच संचालित भी किया। इसके बाद स्वामी नरेन्द्रानन्द ने प्रवचन करते हुए कहा कि शास्त्रों में पूर्ण गुरु की दिव्य महिमा को विस्तार पूर्वक रेखांकित किया गया है। ऐसे परम गुरु की महिमा, जो अपने शरणागत शिष्य के अर्न्तमन में ईश्वर को प्रकट करने की अद्वितीय क्षमता रखते हैं, उन्हें ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश कहकर शास्त्रों में अभिवंदित किया गया है। स्वामी जी ने इंसानी मन को उसकी दिशा तय करने वाला तथा संचालित करने वाला सशक्त माध्यम बताते हुए कहा कि यह मनुष्य का मन और कुछ नहीं केवल अनन्त विचारों का एक समूह मात्र है। जैसे विचारों की मन में सजृना मनुष्य करता है और इन्हें इस मन रूपी ‘स्टोर’ में जमा करता जाता है, उन्हीं के अनुसार उसका जीवन भी संचालित होने लगता है। महापुरूषों ने इस मन की दिशा को सकारात्मक स्वरूप प्रदान करते हुए इसे ईश्वरोन्मुख किए जाने की बात पर ज़ोर दिया है, पूर्ण गुरू का सत्संग इस मन की बेलगाम गति पर नियंत्रण लगाता है। सत्संग में ही मानव को ईश्वर तक पहुंचने का दिव्य तथा सटीक मार्ग भी प्राप्त हो जाता है, यह परम गुरू के पावन दरबार की ज्ञान दीक्षा की प्राप्ति के उपरान्त ही सुलभ हो पाता है। स्वामी जी ने आगे कहा कि यह मनुष्य की विडम्बना ही है कि वह संसार में आकर इस एक महत्वपूर्ण बात को ही भूल जाता है कि एक दिन यह संसार छोड़कर उसे जाना है। वह मात्र संसार का ही होकर यह जाता है और एक दिन बिना उस परम लक्ष्य को पूर्ण किए ही यहां से विदा हो जाता है। वास्तव में उस परम लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति कर अपना आवागमन समाप्त करने के लिए ही उसे अनमोल मानव तन की प्राप्ति हुई थी। ईश्वर का नाम ही एकमात्र सत्य है, संसार तो मिथ्या कहा गया है, सपने की तरह बताया गया है। भगवान शिव माता पार्वती से इस संबंध में यही कहते हैं- ‘‘सुनहुं उमा कहूं अनुभव अपना, सत्य हरिभजन जगत सब सपना। अंत में स्वामी जी ने बताया कि ईश्वर समय-समय पर इस जगत में अवतार धारण किया करते हैं। सूक्ष्म सत्ता ईश्वर का परम गुरू स्थूल स्वरूप होते हैं।

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